लखनऊ की रोमांटिक शाम |







हज़रतगंज की चहल-पहल में आरज़ू और आदित्य की मुलाक़ात एक किताबों की दुकान पर हुई थी। वो दोनों एक ही किताब को छूने के लिए झुके, और उनकी उँगलियाँ एक-दूसरे से टकरा गईं। आरज़ू की आँखों में शर्म और आदित्य की आँखों में एक चमक थी। वो दिन बारिश का था—लखनऊ की नवाबी सड़कों पर पानी बरस रहा था, और हवा में गुलाब की पंखुड़ियों जैसी खुशबू थी।


"माफ़ कीजिए," आदित्य ने मुस्कुराते हुए कहा। उसकी आवाज़ में वही ठहराव था जो शहर की तहज़ीब में बसता है।

आरज़ू ने नज़रें झुका लीं। उसके गाल गुलाबी हो गए। "जी, कोई बात नहीं।"

ये पहली मुलाक़ात थी, लेकिन दिलों को पता था कि ये आख़री नहीं होगी।




अगले कुछ हफ्तों में वो एक-दूसरे से मिलते रहे। कभी रूमी दरवाज़े के पास चाय की दुकान पर, कभी बड़ा इमामबाड़ा के ठंडे रास्तों पर। आदित्य उसे शेर सुनाता—मीर, गालिब, और अपने खुद के लिखे हुए। आरज़ू उसे देखती रहती, जैसे उसकी बातों में पूरा लखनऊ समा गया हो।

एक शाम वो गोमती नदी के किनारे बैठे। सूरज डूब रहा था, और पानी पर सुनहरी लहरें नाच रही थीं। आदित्य ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया। उसकी उँगलियाँ आरज़ू की उँगलियों से जुड़ गईं, और एक बिजली सी दौड़ गई।

"आरज़ू," उसने धीरे से कहा, "तुम्हें पता है, मैं तुमसे प्यार करता हूँ।"

उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस उसके कंधे पर सिर रख दिया। उसकी साँसों की गर्मी आदित्य की गर्दन पर महसूस हुई। उसके बालों में चमेली का तेल था, और खुशबू ने आदित्य को पागल कर दिया।

वो देर तक वहीं बैठे रहे। फिर आदित्य ने उसका चेहरा अपनी हथेलियों में लिया और धीरे से उसके होंठों को चूम लिया। आरज़ू ने आँखें बंद कर लीं। उसकी जीभ धीरे-धीरे आदित्य के होंठों को छूती रही, और दोनों के बीच की दूरी मिट गई।

आदित्य का हाथ उसकी कमर पर आ गया। उसने उसे अपनी तरफ खींचा। आरज़ू की साँसें तेज़ हो गईं। उसने आदित्य की शर्ट के बटन खोलने शुरू किए, लेकिन आदित्य ने उसका हाथ रोक लिया।

"यहाँ नहीं," उसने फुसफुसाया। "चलो मेरे घर चलते हैं।"

आरज़ू ने सिर हिलाया। उसकी आँखों में चाहत थी, और डर भी। लेकिन वो जानती थी कि ये सही है।




आदित्य के घर का माहौल शांत था। मोमबत्तियाँ जल रही थीं, और बेडरूम की खिड़की से ठंडी हवा आ रही थी। आरज़ू ने अपनी दुपट्टा उतारा और बिस्तर पर बैठ गई। आदित्य उसके सामने घुटनों के बल बैठा और उसकी साड़ी का पल्लू धीरे से हटाया। उसकी गर्दन, उसके कंधे, उसकी बाँहें—सब कुछ मोमबत्ती की रोशनी में चमक रहा था।

आदित्य ने उसकी गर्दन पर होंठ रखे। आरज़ू ने आह भरी। उसकी जीभ धीरे-धीरे गर्दन से नीचे उतरती गई, कॉलरबोन तक। आरज़ू ने आदित्य के बालों में उँगलियाँ फँसा दीं और उसे अपनी छाती पर खींच लिया।

आदित्य ने उसकी ब्लाउज़ के बटन खोले और ब्रा को नीचे सरकाया। उसके स्तन सख्त हो गए, निप्पल मोमबत्ती की रोशनी में गहरे गुलाबी दिख रहे थे। उसने एक निप्पल को अपने मुँह में लिया और चूसने लगा, जीभ से गोलाई में घुमाता रहा। आरज़ू ने पीठ झुकाई और जोर से साँस ली।

"आदित्य..." उसकी आवाज़ काँप रही थी।

उसने दूसरे निप्पल को भी वही नहलाया, और उंगलियों से पहले वाले को दबाया। आरज़ू की पूरी देह काँप रही थी। उसकी साड़ी के नीचे पेटिटकोट गीला हो रहा था, और वो अपने पैरों को कसकर दबा रही थी।

आदित्य ने उसे पूरी तरह लिटा दिया और उसकी स्कर्ट ऊपर की। उसकी जाँघें खुल गईं। आदित्य ने उसकी पैंटी को एक तरफ खिसकाया और देखा—वहाँ एक नम, गुलाबी चीरा था, जो पहले से ही तरबतर था।

उसने अपनी उँगली से उसकी भीगी हुई जगह को सहलाया। आरज़ू ने करवट ली और बिस्तर को पकड़ लिया।

"प्लीज़, आदित्य... अब और मत तड़पाओ।"

वो मुस्कुराया। उसने अपनी पैंट उतारी और उसके ऊपर आ गया। उसका लिंग सख्त और गर्म था, और उसकी नोक से थोड़ा सा तरल निकल रहा था। उसने उसे आरज़ू की चाशनी में डुबोया और धीरे-धीरे अंदर सरकाया।

आरज़ू ने चीख़ निकाली—दर्द और सुख का एक अनोखा मिश्रण। आदित्य ने उसे रुकने दिया, फिर धीरे-धीरे आगे-पीछे करने लगा। हर बार वो और गहरा जाता, और आरज़ू की नम दीवारें उसे निचोड़ रही थीं।

"तेज़... और तेज़..." आरज़ू ने फुसफुसाया।

आदित्य ने अपनी रफ़्तार बढ़ा दी। उसके अंडकोष उसकी जाँघों से टकरा रहे थे, और कमरे में सिर्फ़ उनकी साँसों और चूत और लिंग के घर्षण की आवाज़ आ रही थी। आरज़ू का शरीर काँप रहा था, और वो अपने नाख़ून आदित्य की पीठ में गढ़ा रही थी।

"मैं... आ रही हूँ..." उसने बुदबुदाया।

उसका शरीर एक बार कस गया—फिर छूट गया। उसकी चूत की मांसपेशियाँ लहरा रही थीं, और गर्म रस बह निकला। आदित्य ने दो और जोरदार धक्के लगाए और फिर अपना बीज उसके अंदर छोड़ दिया। वो उसकी गोद में गिर गया, दोनों पसीने से तर और थके हुए।

बहुत देर तक वो एक-दूसरे के बाहों में पड़े रहे। खिड़की के बाहर लखनऊ की रात गुनगुना रही थी—कोयल की आवाज़, दूर से अज़ान की गूँज, और पत्तों पर गिरती ओस।

आरज़ू ने आदित्य के सीने पर अपना सिर रखा और आँखें बंद कर लीं। उसे लगा जैसे इस शहर की हर गली, हर इमारत, हर बूँद बारिश ने उसे इस पल के लिए तैयार किया था।

"लखनऊ तुम्हारे बिना अधूरा है," आदित्य ने उसके कान में कहा। "लेकिन तुम्हारे साथ, ये शहर एक कहानी है।"

आरज़ू ने मुस्कुराकर उसे और जोर से गले लगाया। वो जानती थी—ये सिर्फ़ एक शाम नहीं थी। ये एक नई शुरुआत थी। लखनऊ की नवाबी हवाओं में बसी एक रोमांटिक कहानी, जो अब हमेशा के लिए अधूरी नहीं रहेगी।










 

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